शाम के ६ बजे थे
पर थके मंदे सूरज के चेहरे पे १२ बजे थे।
पर्च्छाइयां फैल कर धूमिल हो चुकी थीं।
थोड़ी देर और लगी होगी
थक कर चूर सूरज रजाई में कहीं खो गया था।
आसमान में गजब रंगीनी थी और हवा में इक नशा।
एका एक अपने अस्तित्व के अहसास से जुगनू झूम उठे।
काली सिया रात में आसमानी बादशाहत का जुनून जुगनुओं के सिर चढ़ बोला।
आग लगा देंगे।
आग लगा देंगे।
उत्पात अथाह था।
पर हर रात की है एक सुबह।
सूरज ने ली एक अंगड़ाई।
सुबह की पहली किरण ने
मिटा दिया था पागल जुगनुओं का वज़ूद।